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मित्रता ~ दो स्ती
यह कि तना अद्भुत और सुंदर अनुभव है….. है ना ? कैसे कुछ अपरि चि त और एक-दूसरे से पूरी तरह अंजा न लो ग,
समय के सा थ गहरे मि त्र बन जा ते हैं! वो चेहरे, जि न्हें आप पहले कभी पहचा नते तक नहीं थे, आज आपके सबसे
अच्छे दो स्त हैं और अब आप एक-दूसरे को इतनी गहरा ई से जा नते-समझते हैं, मा नो को ई आपका अपना ही परि वा र
हो । सच कहूँ तो , यह कि सी “चमत्का र” से कम नहीं है।
हाँ , हाँ … मैं जा नता हूँ कि आप शा यद इन सब बा तों में वि श्वा स न करते हों , किं तु तनि क सो चि ए तो सही , कि कैसे हुआ
ये चमत्का र? कभी -कभी तो जी वन ऐसा मो ड़ लेता है कि जि स इंसा न को आप देखना तक पसंद नहीं करते थे, वही
अंततः आपका सबसे घनि ष्ठ मि त्र बन जा ता है। वैसे तो हमा रा स्वभा व ही है कि हम हमेशा अपने जैसों की ही खो ज में
रहते हैं। क्यों …..!! सही कहा ना ?
यह आवश्यक नहीं है कि आपका मि त्र आपकी को ई प्रति लि पि हो , भले आप ढूंढ वैसा ही रहे थे। आख़ि र आप एक
दो स्त चा हते हैं, अपना क्लो न नहीं ! मि त्रता में को ई छि पे हुए नि यम व शर्तें ला गू नहीं हो ती और न ही कि सी प्रका र की
को ई प्रति यो गि ता क्यों कि आपकी दो स्ती को ई रि यलि टी शो या स्पो र्ट्स इवेंट नहीं !!
या र बि ना चैन कहां रे.…
मि त्रता की नहीं जा ती बस नि भा ई जा ती है, समय समय पर या फि र यूं कहा जा ए कि हर समय जैसे कभी चा य के कप
में सा थ, तो कभी बि ना का रण गपशप में सा थ देकर। ये एक ऐसा रि श्ता है जो जन्म जन्मां तर तक तो नहीं परन्तु आपके
इस जी वनका ल का सा थी नि श्चि त ही हो ता है। और सच कहूँ तो , एक जी वनका ल के लि ए एक सच्चा दोस्त मि ल जा ना
ही बहुत बड़ी बा त है! जि समें को ई बड़ा -छो टा , ऊंच-नी च, अमी र-गरी ब जैसा भेद-भा व, पक्षपा त नहीं हो ता है और जहां
है अर्था त् वो को ई मि त्रता नहीं अपि तु स्वा र्थ संबंध मा त्र है, जि सका अंत अत्यंत नि कट है।
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